"मेरी अनिवार्यता का अंत"


    

"मेरी अनिवार्यता का अंत"

क्या होगा...
अगर मैं किसी हादसे में मारी जाऊँगी?
मेरी मौत — बस नियति मान ली जाएगी,
अख़बार के किसी कोने में
मेरा नाम छपेगा,
एक धुंधली-सी तस्वीर के साथ।

मेरे "अपने" —
जो बस नाममात्र ही अपने हैं,
थोड़े आँसू बहा लेंगे,
ये सोचकर कि
"लोग क्या कहेंगे,
बेचारी को दो बूँद आँसू भी नसीब न हुए..."

कुछ रिश्तेदार
जो नाम याद रखते हैं मेरा,
सोलह पन्नों के अख़बार में
मुझे ढूँढेंगे,
अगर मिल गई
तो पड़ोसियों को गर्व से बताएँगे —
"हम जानते थे उसे..."

जीवन का कोई ठिकाना नहीं रहा अब।

मित्र-मंडली के कुछ सदस्य
मेरा फ़ोटो स्टेटस पर लगाएँगे,
काली पट्टी के साथ,
और बहाएँगे डिजिटल आँसू —
"RIP" कहने की औपचारिकता निभा लेंगे।

कुछ दिन बाद
सब सामान्य हो जाएगा।
मैं,
घर की किसी दीवार पर टंगी तस्वीर बन जाऊँगी —
मुस्कुराती हुई।

लेकिन वो मुस्कान,
अब किसी को असली नहीं लगेगी।
क्योंकि
आख़िरकार, मेरी अनिवार्यता
समाप्त हुई।

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