मुहब्बत का मुसाफिर

 दिन में चराग जलाये बैठें हैं

सुबह को शाम बनाये बैठे हैं

हर पल पर तेरी यादो का पहरा हैं

आँखो में तेरा ख्याब सजाये बैठे हैं

तलब हैं तुझे पाने की मुद्दतो से 

जमाने की हर बात भुलाये बैठे हैं

पाने को बस तुम और खोने को जहा

हम तब भी खुदी से आस लगाए बैठे हैं

मुहब्बत की मुसाफिर हू जनाब 

हर  गम को गजलो में समाये रखी हू..... 😊

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