चापलूसकारिता

 पत्रकारिता में एक नया शब्द सामने आया हैं वो शब्द हैं " चापलूसकारिता"।

चापलूसकारिता की बात करे तो इसका इतिहास उतना ही पुराना है जितना की पत्रकारिता का हैं। कुछ लोगों को दुसरे की बुराई करके आनन्द आता हैं। ठीक उतना की जितना की किसी को उसके अच्छे काम के लिए सम्मानित किया जाता। और ऐसे लोग ही जब पत्रकारिता जैसे सामाजिक काम को व्यावसायिक काम के रूप में अपनाते है तो अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए चापलूसी का प्रयोग करते है वही से चापलुस्कारिता शब्द का उद्भव हुआ हैं। महाभारत में दुर्योधन के मामा सकुनी अपना बदला पूरा करने के लिए ही कौरवों का विनाश करवाया चापलूसी करके। समय के साथ चापलूसकारिया बढ़ती गई। वर्तमान में आपको हर दिन पत्रकारिता में   चापलूसकारिता दिखते नजर आती हैं। जिस पत्रकारिता को राष्ट्र का चौथा स्तंभ माना जाता हैं। वही पत्रकारिता अब सत्ता की चापलूसी करने का अपना परम कर्तव्य मानती है। जिस पत्रकार को जनता की बात को सत्ता के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए वही पत्रकार आज  सरकार की तानाशाही का साथ देते नजर आ रही हैं। 

  ये बात अलग है की पहले पत्रकार अब की तरह पहले सत्ता का खुल कर समर्थन नहीं किया करते थे। पर अभी के दौर में सत्ता की चापलूसी करने में नही झिझकते हैं। ऐसा नहीं पत्रकारिता में ईमानदार लोग नहीं है पर वैसे लोगों को आए दिन दबाया जाता हैं। अभी के दौर में पत्रकारिता पर पूंजीपतियों का दबदबा है । पटना के लोकप्रिय शिक्षक खान सर  व्यंगात्मक लहजे में आज के मीडिया के बारे में कहते हैं कि " पहले के ज़माने में बड़े लोग अपनी बात को खुद न कह कर किसी से कहवाते थे ।आज की मीडिया भी वही कर रही हैं। सत्ता की वकालत। जो सत्ता की वकालत नहीं करते वैसे मीडियाकर्मी को मीडियाहाउस वैसे निकालती हैं जैसे दूध में पड़ी मक्खी को लोग निकल फेंकते है। आखिर पत्रकरिता की ये दुर्दशा का जिम्मेवार कौन हैं?? सवाल गंभीर है आखिर  जवाब कौन देगा?


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