जो न समझे पीर पराई
अपना दर्द तो हर कोई महसूस करता हैं, पर सही मायने में इंसान वही कहलाने के लायक है जिसे अपने अलावे भी औरों का दर्द महसूस हो। मानव सभ्यता के विकास के साथ इसलिए समाज का निर्माण हुआ, ताकि लोग सुख दुःख में लोग के दूसरे का साथ बने। पर अफसोस हमारा समाज ने बीते सदी से अब तक विकास के पराकाष्ठा पर पहुंच कर समाज निर्माण के उस अवधारणा को ही बदल डाला। आज समाज के हर वर्ग बस अपनी तरक्की चाहते चाहे उस तरक्की के की कीमत समाज में रह रहे अनेक लोगों को जान देकर ही क्यों न चुकाना पड़े। व्यक्तिगत रूप से संपन्न हो जाने से क्या सामाजिक दायित्व खत्म हो जाती है? नहीं तो संपन्न होने के बाद समाज में रह रहे और लोगों के बारे में क्यों नहीं सोचते? समाज में हर वर्ग की भागीदारी तो फिर जिम्मेवारी का भाव संपन्न लोगों में खत्म क्यों हो जाता हैं? ऐसा नहीं की मुझे संपन्न लोगों से समस्या है हो भी तो क्यों उनकी संपन्नता तो उनकी मेहनत का परिणाम हैं। बस मुझे तकलीफ इस बात की होती हैं। वे अपने संघर्ष के दिन को कैसे भूल कर उनका शोषण करते है जो दो वक्त खाना खाने के लिए संघर्षरत है। क्या संपन्नता सचमुच मानवाता को हर लेती है?🤔




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