मॉब लिंचिंग
"भीड़ का न्याय,हमेशा अन्याय होता हैं।"
उक्त पंक्ति का आशय हैं कि मॉब लिंचिंग हमारे समाज में अभिशाप हैं। क्या किसी को अफवाह के आधार पर भीड़ के द्वारा हमला किया जाना न्याय हैं? अगर आप इस बात से सहमत हैं तो हर अपराधी को सजा मॉब लीचिंग के जरिए मिल जाएं। हमारे देश में न्यायपालिका की क्या ज़रूरत रह जायेगी?
मॉब लिंचिंग
भीड़ हत्या या मॉब लिंचिंग पूर्वचिन्तित बिना किसी व्यवस्थित न्याय प्रक्रिया के, किसी अनौपचारिक अप्रशासनिक समूह द्वारा की गई हत्या या शारीरिक प्रताड़ना को कहा जाता है।
मॉब लिंचिंग के कारण
हमारा देश विभिन्नताओं में एकता का प्रतीक हैं। यहा अनेक जाति, धर्म, समुदाय के लोग रहते हैं। ऐसे में सभी जाति, धर्म, समुदाय को एक सूत्र में बांधने के लिए हमारे संविधान के आर्टिकल 25-28 में धर्म की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार के रूप में दिया गया है। आधुनिक युग में लोगों में व्यक्तिवाद पनपता जा रहा है। जिस वजह से कभी धर्म को लेकर,कभी जाति को लेकर कभी समुदाय को लेकर उन्माद करते रहते हैं। लोग अपने धर्म अपने समुदाय अपनी जाति को सर्वोपरि मानकर विभिन्न जाति समुदाय और धर्म को मानने वाले लोगों से घृणा करते हैं। लोग इतने उग्र हो जाते हैं कि दूसरे धर्म वाले लोगों के बेमतलब का हिंसात्मक रवैया अपनाते हैं। और ऐसे लोग भीड़ का फायदा उठाकर मॉब लिंगिग को अंजाम देते हैं।
वर्ष 2002 में हरियाणा के पाँच दलितों की गौ हत्या के आरोप में लिंचिंग कर दी गई थी। वहीं सितंबर 2015 में एक अज्ञात समूह ने मोहम्मद अखलाक और उनके बेटे दानिश पर गाय की हत्या करने और मांस का भंडारण करने का आरोप लगाते हुए पीट-पीट कर उनकी हत्या कर दी थी। इन घटनाओं से मॉब लिंचिंग में धर्म और जाति का दृष्टिकोण स्पष्ट तौर पर ज़ाहिर होता है।
इतना ही नहीं आए दिन मॉब लिंचिंग की घटनाएं हमारे देश में दिन- ब- दिन बढ़ती ही जा रही हैं। जो की निंदनीय है, लोकतांत्रिक देश में इस तरह की घटना यहां के प्रशानिक व्यवस्था पर चोट करती हैं। राज्य सरकार को इस बारे में सोचने की जरुरत हैं। और इसे कम करने के लिए सख्त से सख्त कानून बनानी चहिए, ताकि कोई बेकसूर मॉब लांचिंग में मारा न जाये।



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