चांद एक नाम अनेक
वैसे हम सभी चांद को बचपन से ही देखते है रहे है। चांद अब भी वैसा ही जैसा बचपन में हुआ करता है। ये बात अलग है कि चांद हर रोज एक सा नहीं दिखता। इसकी कलाए बढ़ती- घटती रहती है। चांद के महीने भर का आकलन किया जाए तो हर दिन यह अलग दिखता हैं। चांद के निकलने का समय भी हर दिन बदलते रहता है। ये तो हो गई चांद की प्रकृति की बात। अब इस से इतर इस चांद के प्रति हमारी बदलती नजरिए की बात करे, तो। बचपन में हम सभी ने सुना है " चंदा मामा दूर के"। अक्सर मां अपने बच्चे को खाना खिलाते समय कहती हैं कि खा लो नहीं तो चंदा मामा खाना खा जाएंगे तुम्हारा। बच्चा बिना सोचे समझें खाना चट कर जाता है। बचपन में चांद हमें मामा जैसा प्यारा लगता हैं। धीरे -धीरे हम एक उमर के दहलीज लांघकर युवावस्था में कदम रखते हैं। इश्क- मुहब्बत में पड़ते हैं। फिर हम चांद की तुलना अपनी माशूका के चेहरे से करते है। और गुनगुनाते हैं - चांद सी महबूबा हो मेरी... । इश्क - मुहब्बत के झमेले से निपटते हुए जब वैवाहिक जीवन में प्रवेश करते हैं आस्था के रूप में उसी चांद को स्थापित करते है, समय -समय पर चांद को पूजते हैं। बात यही खतम नहीं हो जाती दांपत्य जीवन को बढ़ाने के क्रम में हम उसी चांद को देखते हुए चांद सी संतान की कामना करते हैं। और उस मनोकामना की प्राप्ति के लिए चांद की आराधना करते हैं।




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