शायरी
@ढाल चुकी है शाम ये पहर कैसा है#
पसरा है सन्नाटा ये शहर कैसा हैं##
आगोश में भरने को बेताब है ये राते#
आने वाली सुबह का ये इंतजार कैसा हैं##
@चाहते बाकी है
राहते बाकी है
ये नायाब शहर है जनाब
अभी जीने की कुछ ख्वाइश से बाकी हैं🤩
दर्द -ए- जमाने का किसको महसूस होता है
बीतता खुद पर है तो सबको तकलीफ होता है
बसना तो हर कोई चाहता है तम्मनाओ के शहर में
पर बसता वही है जहां जिसका नसीब होता हैं 🥲





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