"संघर्ष ही जीवन है"
मैंने बचपन से सुना हैं " संघर्ष ही जीवन हैं" तब तो मुझे ये पता भी नहीं था कि ये संघर्ष क्या होता है। पांच साल के बच्चे को तब ये शब्द समझ पाना उतना ही कठिन था, जितना की किसी बुजुर्ग को बेवजह खिलखिला कर हस पड़ना। हालांकि पांच साल के बच्चे के जीवन में भी कई संघर्ष होते हैं। जैसे उसके वजन के बराबर स्कूल बैग को ढोना। उसके मन न होने पर भी जबरदस्ती दूध से भरी ग्लास मुंह में उड़ेल दिया जाना। कहा ये भी जाता है कि संघर्ष के बिना कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है। संघर्षरत इंसान कभी न कभी सफल जरूर होता है। तो इस तरह से अगर आपको सफलता पानी है तो संधर्ष करना पड़ेगा। आखिर सफलता पाने के लिए संघर्ष करने का पैमाना क्या होना चहिए?ये बड़ा ही महत्वपूर्ण सावल हैं, क्योंकि सांस लेना भी एक तरह का संघर्ष हैं ये बात मैं इसलिए कह रही हूं की जो भी सांस की बीमारी ( दम्मा) से जूझ रहे है उन्हें सांस की कीमत पता हैं।
वे सांस लेने के लिए हजारों खर्च करते हैं ।
एक मजदूर दो जून की रोटी के लिए पुरे जीवन संघर्ष करता हैं। उसकी सफलता ये हैं की उसे उसके मेहताना से दो जून की रोटी नसीब हो। एक किसान ताउम्र जी तोड़ मेहनत करता है, ताकि वह अपने परिवार के मूल जरूरतों( रोटी,कपड़ा, मकान) को पूरा कर सकें। और अपने परिवार की मूलभूत जरूरतों को पुरा कर पाना ही उसके संघर्ष से मिली सफलता हैं। ऐसा नहीं की उसके ताउम्र संघर्ष के बाद भी ये सारी जरूरते समय पर पूरी हो ही जाती हैं। पर ये जरूर हैं की वो इस जरूरत के लिए जीवन भर संघर्षरत रहता है।
एक विधार्थी का संघर्ष पल - पल का होता हैं, क्योंकि उसे एक समय सीमा भीतर अपने लक्ष्य को हासिल करने का दवाब होता हैं। कई बार वह तय सीमा के भीतर अपने लक्ष्य को हासिल कर लेता है तो वही कई बार अपने लक्ष्य से चूक जाता है। ये बात अलग है कि एक सच्चा विधार्थी अपनी असफलता को दरकिनार कर फिर से सफलता पाने की चाह के साथ संघर्ष करने लगाता हैं।



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