क्या रोना???


यहाँ तक तो बात समझ में आती है, 

कि आदमी किसी को चाहता है

 तो उसे हासिल भी करना चाहता है,

और अगर हासिल नहीं कर पाता,

तो दुखी होता है, रोता है, 

पर जो बात समझ में नहीं आती वह यह, 

कि आदमी अनायास क्यों किसी को चाहने लगता है?

पहले ही क्यों नहीं आँक लेता,

 कि उसको पाने की क्षमता उसमें है या नहीं?

या फिर उसके चाहे हुए आदमी में,

 प्राप्त किये जाने लायक, गुणवत्ता या योग्यता,

है या नहीं?

शायद वह चाहा गया आद‌मी 

चाहने वाले से इतना भिन्न हो,

 इतना बड़ा हो, 

इतना ऊँचा हो, 

कि वह आकाश कुसुम जैसा हो, 

अप्राप्य, पहुँच से परे 

या फिर जघन्य हो, 

घृणित हो, विषैला हो, 

कि उसका विषैलापन असह्य हो, 

दम घुटा देने वाला हो, 

जैसे कि साँप, बिच्छु, बाघ, भेड़िया

इसलिए आदमी को रोना तब चाहिए,

 जब उसकी अच्छे बुरे की पहचान खो जाय, 

वह साँप को थाम ले रस्सी समझकर,

बर्फ से ढँकी हुई नदी को, 

जब समतल समझकर आदमी उसपर चल पड़ता है, तो वह अनजाने ही, 

बेबूझे ही रास्ता से भटक जाता है, 

गिर पड़ता है, और चोट खा जाता है 

सीता को तो तब रोना चाहिए था,

 जब उन्होंने नहीं समझा,

 कि सोने का मृग एक छलावा था, 

राम के कहने पर अग्नि परीक्षा देते हुये रोना,

जनता की माँग पर जंगल में निष्कासित होकर रोना, 

असमय का रोना व्यर्थ का रोना 

फिर क्या रोना??

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