छोटी दुनियां
बढ़ती उम्र के साथ दुनियां छोटी दिखने लगती है
ऐसा नहीं कि दुनियां वाकई छोटी या बड़ी होती है
दुनियां तो वैसी ही रहती हैं जैसा तब थी और अब है
दुनियां से बढ़ती दूरियां ही दुनियां छोटी कर देती है
जब हम अस्तित्व में आते है पलते हैं मां के गर्भ में
हम समझते हैं कि दुनियां बस इतनी-सी है
कई साल बाद जब हम सीख लेते हैं
चलना, बोलना, खाना-पीना,
सुनते है आसपास के लोगों का बोलना
कल्पना की एक दुनियां बना लेते है मन के अंदर
पक्षी-सी उड़ने की अभिलाषा, सूरज को जानने की जिज्ञासा
और न जाने क्या-क्या मन को लुभाने लगता है
जब हम जीवन के कई आयाम से गुजरते हुए
अनुभव की गठरी लादे एक उम्र पर खुद से टकराते हैं
दुनियां सिकुड़ती नजर आती है
और हमें लगने लगता है ये दुनियां कितनी छोटी हैं 😍



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