हर रोज जीकर मरना जीना नहीं होता
कौन कहता है कि इंसान सिर्फ एक बार मरता है
इंसान एक ही जीवन में कई बार मरता है
जब-जब वह हारता हैं अपनो से
तब-तब बस काया ही तो जीवित रहती है
आत्मा तो हर रोज मरती है
जमाना जब ठोकर मारती है असफलताओं पर
तब भी वह तिल-तिल मरता है
देह तो नश्वर है उसका मरना निश्चित है
पर आत्मा जो अजर अमर होते हुए भी
पल-पल क्षण होती है मरती है
किसी पर अपना सब कुछ अर्पित कर
जब कुछ भी अर्जित नहीं होता
तब भी वह मारता ही रहता है जीकर
सांसों का रुकना ही मरना नहीं होता
जी कर हर रोज मरना भी तो जीना नहीं होता 😴


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें