आषाढ़ का मेघ

 


  सूखती धरती के वरदान हो तुम,

पेड़-पौधों में नवजीवन की जान हो तुम।

बरस जाओ जब,

किसानों के अधरों की मुस्कान हो तुम।


तेरी बूंदों में जैसे अमृत बहता है,

हर जीवन जिसकी बाट जोहता है।

जेठ की दुपहरी जब जीवन को मुरझा देती है,

नई उम्मीद बनकर आ जाते हो तुम।


वर्षा ऋतु के राजा का गौरव हो तुम,

घने बादलों में बसा कोई स्वप्निल सुमन हो तुम।

जब पत्ते सूखते हैं, नदियाँ सिकुड़ जाती हैं,

पोखर, ताल, तलैया सब सिमट जाती हैं।


तब सौगात बन, जीवन में उतरते हो तुम,

मन के आँगन में मधुर छटा बिखेरते हो तुम।

आषाढ़ के दिन,

पहली बारिश की मीठी दस्तक हो तुम।

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