"न पाने की चाह, न खोने का डर"
"न पाने की चाह, न खोने का डर"
जब दो आत्माएं प्रेम में उतरती हैं,
तो वे केवल एक-दूसरे को नहीं,
बल्कि एक पूरी सृष्टि को देखने लगती हैं
एक-दूसरे की आंखों में।
प्रेम तब केवल संबंध नहीं रहता,
वो एक अस्तित्व बन जाता है —
जहां ‘मैं’ और ‘तुम’ की सीमाएं मिट जाती हैं।
सच्चा प्रेम वो होता है
जहां न पाने की लालसा होती है,
न खोने का भय।
क्योंकि दोनों
एक-दूजे में ऐसे समा जाते हैं
जैसे नदियां समंदर में।



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