"प्रिय, मैं फँसी मझधार में..."



प्रिय,
मैं फँसी हूँ किसी मझधार में,
और तुम… कहाँ हो?

कहाँ ढूँढूँ तुम्हें?
उस मोड़ पर
जहाँ हम पहली बार मिले थे?
या उस स्थान पर
जहाँ हमने कुछ सपने बोए थे —
साथ चलने के, साथ जीने के?

मिलने से बिछड़ने तक
हमारी हर भेंट
आज भी मेरे अंतर्मन में कैद है —
एक चलचित्र की भाँति,
जो हर दिन
मेरी कल्पनाओं के पर्दे पर चलता है।

मैं जानती हूँ —
अब तुम लौट नहीं सकते,
मेरी लाख पुकारों के बाद भी नहीं।

तुम्हारा असमय चला जाना
मेरे अस्तित्व को निस्तेज कर गया है।

और अब...
मैं आना चाहती हूँ प्रिय —
वहीं, तुम अब हो जहां।
वहीं, जहाँ अब तुम हो।

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