सपनों की नगरी ✍️

 



शहर परेशान है
भीड़ से, धुएँ से, तेज़ ध्वनि से।
चमक दिखाकर बुला लिया है लोगों को—
पक्की सड़क, पर्याप्त बिजली,
स्वच्छ पेयजल, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य...
सब मिलेगा, शहर में।

गांव छोड़कर लोग निकल पड़े
उस सपनों की नगरी की ओर,
जिसे "शहर" कहा जाता है,
जहां भीड़ में इंसान अकेला हो जाता है।

सब कुछ मिलता है,
पर कीमत पहले अदा करनी होती है।
शुद्ध पानी भी नसीब नहीं होता शहरों में,
गली में पहरे होते हैं,
कपड़ों और पैसों से
यहां इज्जत मापी जाती है।

गांव खामोश होकर मुस्कुरा रहा है,
पूछ रहा है—
"सुकून से तो हो वहां?"

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