स्त्री की पीड़ा
मैं हैरान हूँ कि अब तक,
क्यों स्त्रियाँ ही मारी गईं,
दहेज की आग में झोंकी गईं,
या ज़हर पिला कर बुझाई गईं।
कभी अपमानित कर
मायके को लौटा दी गईं,
तो कभी आँसुओं की नदियों में
डुबोकर चुप कराई गईं।
हर युग में उसे ही
कमज़ोर बताया गया,
पति की छाया में जीना है—
ये मायके में सिखाया गया।
ससुराल को ही अपना घर मानो—
ये आदेश बार-बार सुनाया गया,
पर उसके सपनों का
कभी कहीं हिसाब न लगाया गया।
वो जन्म देती है, संस्कार देती है,
पर खुद को मिटाती जाती है,
समाज के कठोर नियमों में
हर युग में बलि चढ़ाती जाती है।


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