"मैं राम नहीं चाहती – आदर्श पुरुषों पर स्त्री के सवाल"
मैं राम नहीं चाहती,
जो मेरी अग्नि-परीक्षा को ही अपना प्रेम साबित माने।
जो राजा पहले हो — और प्रेमी बहुत बाद में।
मैं कृष्ण नहीं चाहती,
जो मीठे बोलों से बहलाए,
पर राधा को दुनिया भर के ताने दिलवाए।
जिसने प्रेम तो किया — पर साथ कभी नहीं निभाया।
मैं अर्जुन नहीं चाहती,
जो वीर था, पर मौन रहा
जब द्रौपदी को भरी सभा में खींचा गया।
क्या वीरता सिर्फ युद्ध में होती है?
सन्नाटे में नहीं?
मैं हरिश्चंद्र नहीं चाहती,
जिसका सच इतना कठोर था
कि पत्नी और बेटे को बेचने में भी धर्म दिखा।
मैं बुद्ध नहीं चाहती,
जो ज्ञान की तलाश में
अपनी पत्नी और बच्चे की नींद उड़ा दे।
बिना बताए, चुपचाप — एक रात में सब कुछ छोड़ चले जाएँ।
मैं वो नहीं चाहती,
जिसे इतिहास ने पूज्य बना दिया
पर मेरी जैसी स्त्रियों को तोड़ दिया।
मुझे चाहिए —
एक ऐसा प्रेम जो
मेरे रोने पर गले लगाए,
न कि चुप रहने को कहे।
एक ऐसा वर जो
मेरे साथ खड़ा हो,
न कि समाज के डर से मुझे अकेला छोड़े।
Pented By:-Ruby Singh








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