बदलते दौर में खोती संस्कृति

 

अब कोई नहीं गाता सावन में कजरी
सावन भी जैसे अब सूना-सा लगता है।
किसी को याद नहीं भादों का बरमाशा
मानो बादल बरसते हैं, पर राग खो गया है।

फागुन आता है, पर
नहीं गूंजता फाग का राग
गाँव की चौपालें भी अब
शहर की खामोशी में ढल गई हैं।

दसई में नहीं जलती झिझिया की लौ
ना ही चैत के चैतावर पर होता जमघट।
जाट-जटीन के गीतों पर
थिरकती औरतों की हँसी कहीं खो गई है।

समां-चकवा अब बस मंच की कहानी हैं
घर-आँगन में उनकी तान सुनाई नहीं देती।
गृहणियाँ भी सोहर-झूमर की जगह
टीवी-रेडियो पर फिल्मी धुनें गुनगुनाती हैं।

निर्गुण, पहरातीं तो जैसे
यादों के अंधेरों में खो गए हैं।
अब मंच पर भी नहीं उतरते
राजा हरीशचंद्र के अमर पात्र।

हाँ, हम बदल रहे हैं,
परिवर्तन स्वाभाविक है—
फिर भी हमें ही बचाना होगा
उस संस्कृति का हिस्सा,
जो मिट्टी की खुशबू संग
मानवता को जीवंत रखता है।

              ✍️Ruby Singh 


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