"मैं हूं — वक़्त!"
एक अनसुनी आवाज़ हूं मैं,
हर दिल की कभी ना बुझी प्यास हूं मैं।
कई चेहरों का नक़ाब हूं मैं,
कभी ख़ुशी, कभी सज़ा का हिसाब हूं मैं।
छुपती नहीं छुपाने से मैं,
हर परछाईं में झलकती एक झलक हूं मैं।
कुछ लोगों का हमराज़ हूं मैं,
जो समझे रूह की बात, वही अंदाज़ हूं मैं।
ढूंढो ज़रा सा... कौन हूं मैं?
कल की सुबह की भोर हूं मैं,
हर नई उम्मीद का एक और हूं मैं।
चुप्पी में भी शोर हूं मैं,
सन्नाटों की आवाज़ का जोर हूं मैं।
मंज़िल का नया मोड़ हूं मैं,
जो भटके उसे सीधा कर दे वो मोड़ हूं मैं।
सबकी कामयाबी की होड़ हूं मैं,
किसी के आगे, किसी के पीछे छोड़ हूं मैं।
कर्मों के फल का जोड़ हूं मैं,
जो जैसा बोए, वैसा ही तोड़ हूं मैं।
सब देख के आत्मविभोर हूं मैं,
पर ख़ुद से ही अक्सर चुपचाप दूर हूं मैं।
तो पहचानो मुझे... अब कौन हूं मैं?
"मैं हूं — वक़्त!"
ना दिखता हूं, ना रुकता हूं,
पर हर किसी की कहानी में लिखा हूं।
✍️ RUBY SINGH




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