"हारते हैं लोग ज़िंदगी से?"


जाने क्यों लोग ज़िंदगी से हार जाते हैं,

माँ-बाप को जीते-जी ही मार जाते हैं।

जो बिना कुछ कहे दिल को छू जाते हैं,

उन्हीं अपनों को हम अकेला छोड़ जाते हैं।


जब बेजान से माँ की कोख में पलते हैं,

माँ-बाप के सपने हमसे जुड़ते हैं।

वो बुनते हैं हमारे लिए अरमान कई,

अपना सब कुछ हम पर लुटा देते हैं वहीं।


माँ की ममता, पिता का स्नेह,

बिन शर्तों के मिलता है जो प्रेम।

पर हम किसी और चाहत में बह जाते हैं,

उनकी उम्मीदों को अनसुना कर जाते हैं।


जब टूटने लगते हैं अपने ही ख्वाब,

नहीं सह पाते दिल के घाव।

तब भूल कर हर अपनापन, हर स्नेह,

ख़ुद चल पड़ते हैं उस अनजान राह पे —

जहां से कोई लौट कर नहीं आता है।

                       ✍️ Ruby Singh 


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