रूह की परछाई


 रूह की परछाई


कहाँ-कहाँ से निकलोगे मुझे?
अपने मन से?
अपने विचारों से?
अपने व्यवहारों से?

मैं तन से लिपटी कोई वस्त्र तो नहीं,
जो उतार फेंको और भूल जाओ।
मैं तेरी रूह में उतरकर,
तेरे हृदय की धड़कनों में बसती हूं।

यादें यूं कब मिटती हैं
भुलाने की कोशिशों से?
मैं रक्त- सी निरंतर बहती हूं,
तेरे चेतनाओं की हर लहर में हूं।

तेरे सपनों की खामोशी में भी
मेरी आवाज़ गूंजती है।
तेरी उदासी के सन्नाटों में
मेरा चेहरा उतर आता है।

तू चाहे जितना भी दूर भाग ले,
तेरे हर कदम के पीछे मैं परछाई बन चलती हूं।
मैं तेरे होने की परिभाषा हूं,
तेरे जीने की अनकही वजह हूं।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट