प्रकृति की पूजा

 



हमने सदियों से पूजी है प्रकृति—

नदियों को मां मानकर,

हिमालय को पिता,

पीपल में वासुदेव देखा,

धरती को जननी कहकर,

सूर्य को देवता बनाया।


पर पूजा के इस आवरण में

हमने किया है उसका दोहन,

भूल गए कि पूजा का अर्थ

सिर्फ झुकना नहीं होता,

संरक्षण और सम्मान भी होता है।


हमने सदियों से बस

अर्थहीन पूजा की है,

पर अर्थ को—

उसके सार को—

कभी समझा ही नहीं।

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