बचपन की मिठाई
हमारे बचपन में
नहीं होते थे पिज़्ज़ा, बर्गर, चाउमिन के ठेले,
नहीं सजी रहती थी चाट की प्लेट झटपट मेले।
मिठाइयों की गिनी-चुनी वैरायटी होती थी,
सुपरमार्केट बस महानगरों में दिखती थी।
मॉल, हॉल, बड़े रास्ते बस अमीरों तक जाते थे,
देश-दुनिया की खबरें अखबार-रेडियो ही सुनाते थे।
गांव अपना लगता था देश, शहर था परदेस,
बाज़ार से सुखी मिठाइयाँ खाते थे बच्चे चाव से।
बीते दशकों में बहुत कुछ बदल गया है—
बाज़ार अब तो हर घर तक आ गया है।
ऑनलाइन शॉपिंग की डोर हर हाथ में है,
फिल्में हॉल से पहले अब नेटफ्लिक्स के साथ में हैं।
दुनिया की खबरें मिनटों में फैल जाती हैं,
यात्राएँ भी बिना सोचे तय हो जाती हैं।
जीवन की शैली बदल गई है चारों ओर,
रेस्त्रां का खाना लगता है दिल को चोर।
दोस्तियाँ अब सोशल मीडिया पर निभाई जाती हैं,
सौंदर्य तस्वीरों से ही परखी जाती हैं।
पर इन सब में एक खालीपन रह गया है—
सुविधाएँ बढ़ीं हैं… मगर सुकून खो गया है।



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