गंगा

 

मैं ग़म का अब ठीक नहीं लगता


यूँ रूठना–मनाना अब ठीक नहीं लगता,

हर बार चुप रह जाना अब ठीक नहीं लगता।


बंधन चाहे प्यार का ही क्यों न हो,

किसी को कैद कर रखना अब ठीक नहीं लगता।


आज़ादी हर रूह की गहरी प्यास है,

किसी को बाँधकर रखना अब ठीक नहीं लगता।


सच्चा रिश्ता वही है जिसमें खुलापन हो,

झूठे रश्मों-क़समों का बंधन अब ठीक नहीं लगता।


परिंदे भी शाम को घर लौट आते हैं,

यूँ पास रहने की बार-बार मिन्नत अब ठीक नहीं लगता।


आईन

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