स्त्रियों की कथित क्रूरता
सदियों से सहती आई हैं स्त्रियाँ,
अपमान, उपेक्षा और घाव।
पुरुषों के अत्याचारों की आग,
मन की गहराइयों में दबती रही,
पर कभी बुझी नहीं।
आज जब औरत ने
अपनी आवाज़ उठाई है,
तो कहा जाता है—
वह कठोर हो गई है,
वह क्रूर हो गई है।
नहीं, यह क्रूरता नहीं—
यह प्रतिरोध है,
यह आत्मसम्मान की वापसी है।
यह उन आंसुओं का हिसाब है
जो पीढ़ियों तक गुमनाम रहे।
स्त्रियाँ अब स्वतंत्र हैं—
शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से।
वे अब झुकना नहीं जानतीं,
वे अब डरना नहीं जानतीं।
पुरुषवर्ग घबराता है,
कतराता है,
क्योंकि उसे डर है—
कहीं वही फसल न काटनी पड़े
जो उसने स्वयं बोई थी।
सच तो यही है—
स्त्रियाँ क्रूर नहीं हुईं,
बस अब वे चुप नहीं रहीं।



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