मां की ममता
तब केवल एक जीव नहीं पलता,
मां का अरमां पलता है,
पिता का सम्मान पलता है,
वंश का सौभाग्य पलता है,
और समाज की उम्मीदें पलती हैं।
नौ महीनों की हर प्रतीक्षा के बाद,
जब वह जन्म लेता है औरत की कोख से,
तो शिशु के संग एक मां भी जन्म लेती है।
मां और बच्चा—दोनों
एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
मां अपना सब कुछ लुटा देती है उस नन्हीं कली पर,
पर जब वही शिशु वयस्क होता है,
तो भूल जाता है मां की ममता,
उसका त्याग और समर्पण।
वह खोज लेता है
अपने लिए एक नई दुनिया,
जहां मां का कोई स्थान नहीं होता।
मां ठगा हुआ महसूस करती है,
आंसू बहाती है किसी कोने में,
और खुद को कोसती है—
उस गलती के लिए,
जो उसने कभी की ही नहीं।



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