काश!
काश! मनुज के रूप बदलते ही,
स्मृतियाँ भी धूम समान विलीन हो जातीं,
हृदय की वेदना की धधकन,
निशि के अन्धकार में खो जातीं।
काश! यात्राएँ पूर्ण होते ही,
पदचिह्न भी समय की धारा संग लौट जाते,
थकी हुई मंज़िलें शान्त हो,
अतीत के पृष्ठों में सो जाते।
काश! यदि व्यक्ति बदलता तो,
काल भी अपना रूप बदलता,
रुष्ट क्षणों को ममता की छाया में
स्नेहिल आलिंगन प्रदान करता।
काश! हमारी मौन व्यथा पर
काल स्वयं गुंजन करता,
अनकहे भावों की धारा को
गगन अपना स्वर प्रदान करता।
काश! मिलन से पूर्व ही
हम अपरिचित हो बिछुड़ जाते,
न पहचान बनती, न पीड़ा जन्म लेती,
न ही व्यथा के स्वर मन को जलाते।
अफसोस न होता तब हृदय को
तुम्हारे कठोर निर्णयों पर,
काश! दूरी से पूर्व ही हम
अनन्त दूरी तय कर जाते।



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