सतयुग की स्मृति

 

मैंने सुना है कभी सतयुग हुआ करता था,

जहाँ झूठ का नामोनिशान नहीं होता था।


सत्य ही मार्ग था, धर्म ही जीवन था,

हर हृदय में करुणा का कंपन था।


कर्म ही पूजा, कर्म ही धर्म था,

मनुष्य का सम्मान ही उसका मर्म था।


ईश्वर वहाँ प्रतिमा में नहीं बसते थे,

हर आत्मा में उनका प्रकाश झलकते थे।


राजा और प्रजा में कोई भेद न था,

सब समान, सब समर्थवान हुआ करते थे।


वह युग अब केवल स्मृतियों में रह गया है,

सतयुग की ज्योति कलियुग में कहाँ खो गया है।


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