चार दिनों की जिंदगी

 


      चार दिनों की ज़िंदगी

ये ज़िंदगी है चार दिनों की,

और ये चार दिन भी आसानी से नहीं कटते।

हर दिन चार लोगों से मिलकर

हम चार बातें करते हैं।

वो चार बातें,

बिना किसी शोर के,

चार और लोगों तक पहुँच जाती हैं।

अपनी सुविधा के अनुसार

ये चार लोग

हमारी बातों पर चार बातें बना लेते हैं।

मेरी माँ कहती है—

लड़की हो, दायरे में रहो।

ये दायरे भी

शायद इन्हीं चार लोगों ने बनाए हैं।

मैं पूछती हूँ—

ये चार लोग कौन हैं,

जो चार दिनों की ज़िंदगी को भी

चैन से जीने नहीं देते?


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