वे मुझे उतना ही जानते हैं

 

                  

वे मुझे उतना ही जानते हैं
जितनी उन्हें मेरी ज़रूरत है।

उन्हें पता है
मैं अच्छा खाना पकाती हूँ,
मैं बड़ों का सम्मान करती हूँ,
और कभी-कभी
उन्हें सुंदर भी लगती हूँ।

मेरा विचार
उन्हें भा जाता है।

बस,
वे मुझे इतना ही जानते हैं।

इसके इतर
उन्होंने कभी कोशिश नहीं की
मुझे और जानने की।

मेरे विचार
किसी सांचे में ढले हुए नहीं हैं
कि कभी ऊबड़-खाबड़ न हों।

मैं कोई साधक नहीं
कि हरदम
अपने आराध्य की खोज में डूबी रहूँ।

मेरी भावनाएँ
कोई चट्टान नहीं
जो हर झंझावात सह जाए।

फिर भी
वे मुझे
बस इतना ही क्यों जानते हैं?

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