सुबह का सच


 मैंने एक सुबह,

सुबह को जागते देखा।

सूरज की पहली किरण में
ज़िंदगी को भागते देखा।

कुछ लोग कंधों पर
ज़िम्मेदारियाँ लादे
काम पर जाते दिखे,
कुछ को पसीने में
सपनों को गढ़ते देखा।

चिड़ियाँ चहकीं,
फूल महके,
हवा में उम्मीद थी।

लावारिस पशु
सड़कों पर भटके,
जैसे पूछ रहे हों
अपना ठिकाना।

कुछ बच्चे
बस्ते टाँगे
स्कूल की राह चले,
और कुछ नन्हे हाथों को
कूड़े में किस्मत टटोलते देखा।

एक ही सुबह थी,
पर हर किसी की
कहानी अलग थी।


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